सहरा की तरफ़ जाकर, इक राह बगूलों में खो जाती है चकरा कर रुक रुक के झिझकती सी, इक मौत की ठंडी सी वादी में उतरती है इक राह उधडती सी छिलती हुई काँटों से जंगल से गुज़रती है इक दौड़ के जाती है और कूद के गिरती है अनजानी ख़लाओं में
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