तेरी आँखें हैं या सजदे में हैं मासूम नमाज़ी
पलकें खुलती हैं तो यूं गूँज के उठती है नज़र
जैसे मंदिर से जरस की चले नमनाक सदा
और झुकती हैं तो बस जैसे अज़ान ख़त्म हुई हो
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