Friday, 22 August 2014

झड़ी

बंद शीशों के परे देख,
दरीचों के उधर
सब्ज़ पेड़ों पे,
घनी शाखों पे,
फूलों पे
वहाँ कैसे चुपचाप बरसता है
मूसलसल पानी

कितनी आवाज़ें हैं,
ये लोग हैं,
बातें हैं

मगर
ज़हन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं
जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

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