मैं इस शहर की मशीन में फिट हूँ जैसे ढिबरी
ज़रूरी है ये ज़रा सा पुर्जा...
अहम भी है क्योंकि रोज़ के रोज़ तेल देकर,
इसे ज़रा और कस के जाता है
चीफ़ मेरा...
वो रोज़ कसता है,
रोज़ इक पेंच और चढ़ता है जब नसों पर,
तो जी में आता है ज़हर खा लूं...
या भाग जाऊं....
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