ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
बहुत जी चाहता है
फिर से बो दूँ अपनी आँखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं
और बुलाऊं बारिशों को
बहुत जी चाहता है
कि फुर्सत हो,तसव्वुर हो
तसव्वुर में ज़रा सी बागबानी हो!
मगर जानां
एक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से की मिटटी नहीं हिलती
किसी की धूप का हिस्सा नहीं छनता
मगर क्या क्यारी के पौधे
पास अपने अब किसी को
पाँव रखने के लिए भी थाह नहीं देते
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम?
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