Thursday, 7 August 2014

हिरन

सुबह से शाम हुई
और हिरन मुझको छलावे देता
सारे जंगल में परेशान किए घूम रहा है अब तक...
उसकी गरदन के बहुत पास से गुजरे हैं कई तीर मेरे...
वो भी अब उतना ही होशियार है
जितना मै हूँ!

इक झलक दे के जो गुम होता है वो पेड़ों में..
मैं वहां पहुँचता हूँ तो टीले पे..
कभी चश्मे के उस पार नज़र आता है..
वो नजर रखता है मुझ पर!
मैं उसे आंख से ओझल होने नही देता!!

कौन दौड़ाये हुए है किसको!
कौन अब किसका शिकारी है पता ही नही चलता...!

सुबह उतरा था मैं जंगल में
तो सोचा था के...!
उस शोख हिरन को
नेजे की नोक पे
परचम की तरह तान के
मैं शहर में दाखिल होऊंगा...!

दिन मगर ढलने लगा है...
दिल में इक खौफ सा अब बैठ रहा है
के..!
बिल आखिर ये हिरन ही...!
मुझे सींगों पर उठाए हुए
इक गार में दाखिल होगा...!!

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