Saturday, 12 July 2014

शीशा और सूरज

छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास के अन्दर छुप के बैठा
मेरी आँख पे सूरज मार के ख़ुश होता है
हँसता है

सूरज ख़ुश है
छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास में रख के खेल रहा है
मेरी आँख पे छींटे मार के छेड़ रहा है

आँख पे एक हथेली रख के
मैं फ़ौरन दोनों की आँखों से ओझल हो जाता हूँ

उँगलियों की झिर्रियों से वो दोनों झाँक के
मुझको ढूँढने लगते हैं
और मैं आँखें बंद किये
तेरी गोद में सर रख के छुप जाता हूँ
क़ायनात से आँख मिचोली खेल रहा हूँ

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