उसे फिर लौट के जाना है
ये मालूम था उस वक़्त भी
जब शाम की सुर्खो सुनहरी रेत पर वह दौड़ती आई थी
और लहरा के
यूं आग़ोश में बिखरी थी
जैसे पूरे का पूरा समंदर
ले के उमड़ी है
उसे जाना है
वो भी जानती थी
मगर हर रात फिर भी हाथ रख कर
चाँद पर खाते रहे कसमे
ना मैं उतरूँगा अब साँसों के साहिल से
ना वो उतरेगी
मेरे आसमाँ पर झूलते तारों की पींगों से
मगर जब कहते-कहते दास्ताँ
फिर वक़्त ने लम्बी जम्हाई ली
ना वो ठहरी
ना मैं ही रोक पाया था
बहुत फूँका सुलगते चाँद को
फिर भी उसे इक इक कला घटते हुए देखा
बहुत खींचा समंदर को
मगर साहिल तलक हम ला नहीं पाये
सहर के वक़्त फिर उतरे हुए साहिल पे
इक डूबा हुआ ख़ाली समंदर था
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