इंस्पेक्टर वागले सोच रहा था
लड़की बड़ी चिकनी है.
आंसू बहते चले जा रहे हैं और गालों पे
रुकते भी नहीं.
बीच बीच में वो पोंछती
तो उसे डर लगता कहीं गाल का तिल भी न धुल जाए.
जो कह रही थी
उसकी तरफ वागले का कोई ध्यान नहीं था.
रोज़मर्रा का किस्सा है.
स्कूल से भाग के एक दोस्त के साथ नेशनल पार्क में घूमने गई थी.
वहां तीन चार गुंडों ने चाकू दिखा के धर लिया. लड़के को पीट घसीट के दूर ले गए
और एक ने उसकी...
क्या कहते हैं....इज्ज़त उतारने की कोशिश की.
लड़की थी कम उम्र की,
लेकिन लगती नहीं थी.
पक चुकी थी.
वरना स्कूल से भाग के नेशनल पार्क में घूमने क्यूं गई थी.
वो भी दोपहर में!
क्या उम्र है तुम्हारी....?
उसने अचानक पूछ लिया.
फ़ोरटीन...!
फ़ोरटीन क्या...?
उसकी आवाज़ में धमक थी.
चौदह साल.
नेशनल पार्क में क्या करने गई थी?
यूंही...
घूमने...
ज्येन्ती के साथ...
मेरा दोस्त...
स्कूल से भाग के?
वो चुप रही.
मां-बाप को मालूम है?
नहीं!
ख़बर करूं...?
नंबर क्या है घर का?...
आंसू अभी अभी पोंछे थे
फिर बहने लगे.
लड़की ने सहम के हाथ जोड़ लिए.
उन्हें मत बताइए
प्लीज़!...
ज्येन्ती को बचाइए.
वो लोग मार डालने की धमकी दे रहे थे.
इस बार वागले उठ के उसके साथ वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया
और अपने हाथ से गाल का तिल पोंछ के देखा
वो मिटा नहीं.
लड़की को हाथ से पकड़ के थाने के पीछे एक खोली में ले गया.
तू बैठ यहीं.
मैं राउंड मार के आता हूं.
मिला तो उसे भी लेकर आता हूं.
और किसी हवलदार से बात नहीं करने का
क्या?
जाते हुए बाहर से कुंडी मार दी.
हवलदार से कह दिया,
देखना शोर नहीं करे!
मोटरसाइकिल पर पार्क का राउंड मारते हुए वागले ने कोई चेहरा नहीं देखा.
सिर्फ़ उसी चिकनी का चेहरा नज़र में घूमता रहा. ज़्यादा देर करना भी ठीक नहीं था
और बहुत जल्दी लौटने में भी बात बिगड़ जाती.
रानों में मोटरसाइकिल दबाए वो दो राउंड मार गया.
घंटे भर के बाद लौटा
तो सीधा दफ़्तर में गया.
रजिस्टर उठाया और हवलदार से कहा
ख़्याल रखना
मैं लड़की का स्टेटमेंट लेने जा रहा हूं.
हवलदार ने खड़े खड़े करवट ली.
उधर मत जाइए साहब,
बड़े साहब आए हैं.
कौन?...
चितले?...
जी! वहीं खोली में हैं.
वागले ने मां की गाली दी.
वहां क्या कर रहा है?
हवलदार के होंठों तले एक डरी सी मुस्कराहट कसमसा रही थी
स्टेटमेंट ले रहे हैं.
आधा घंटा हो गया.
दरवाज़ा अंदर से बंद है.
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