Saturday, 19 July 2014

बूढ़े पहाड़ो पर

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला
सदियों से गिरी बर्फें
और उन पे बरसती हैं
हर साल नई बर्फें
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला

घर लगते हैं कब्रों से
खामोश सफेदी में
कुत्बे-से दरख्तों के ...

तारीख का कहना है
रहना चट्टानों को
दरियाओं को बहना है
अब की तुग्य़ानी में
कुछ डूब गए गाँव
कुछ बह गए पानी में ...

नानी की अगर माने
तो भेडिय़ा जिन्दा है
जाएँगी अभी जानें ...

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला

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