Wednesday, 23 July 2014

रेप मार्किट 2

ये बात सिर्फ़ ड्राइवर और कंडेक्टर को मालूम थी कि पीछे से चौथी सीट पर बैठी अकेली सवारी एक महिला थी,
जो सबसे आखिर में उतरेगी.
उसे शिवड़ी पहुंचना था.
और वो ‘धानू रोड’ से चलने के बाद दिन में कई बार पूछ चुकी थी कि बस शाम को कितने बजे ‘दहेसर’ पहुंचेगी.
क्योंकि वहां से बस बदल कर शहर बंबई में जाना था.
उसका बेटा और शौहर वहीं बंबई की किसी फैक्ट्री में काम करते थे.
रात को देर हो गई तो कहां भटकेगी टैक्सी लेकर. उधर तो आटो भी नहीं चलता.
और भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं है...
टैक्सी के!

चौथी बार जब महिला ने ये बात दोहराई तो शाम हो चुकी थी.
अंधेरा उगने लग गया
गाड़ी अभी अपनी मंजिल से बहुत दूर थी.
सिर्फ़ एक पसेंजर और था,
और वो भी अपनी खिड़की में सर दिए ऊंघ रहा था.
कंडेक्टर महिला के पास ही बैठ गया और बोला
तू क्यों फिक्र करती है बाई,
बंबई तो सारी रात जगमगाती रहती है.
तू खोएगी नहीं!...
और बंबई तो अजीब बस्ती है,
कोई खो जाए तो बंबई ख़ुद उसे ढूंढ़ के मंजिल पर पहुंचा देती है.

बाई की कुछ समझ में नहीं आया.
ज़रा सी मुस्करा दी...बस!

ड्राइवर ने आंख मारी.
कंडेक्टर पास आया तो बोला
बाई में नमकहै...!
हाथ-पांव टाइट हैं अभी तक.
वो दूसरा कुंभकरण कहां उतरेगा?

अचानक खिड़की में सोया मुसाफिर जाग गया.
विरार निकल गया क्या?
हां...कब का...!

अरे-अरे...रोको!

ड्राइवर ने फिर आंख मारी और गाड़ी रोक दी. जल्दी जल्दी मुसाफिर ने अपने थैले बैग संभाले और उतर गया.

इस बार कंडेक्टर ने आंख मारी.
साले को विरार से पहले ही उतार दिया.
एक ख़ामोश से हाथ पे हाथ मारा दोनों ने.
आंखें कुछ और ही कह रही थीं.
बाई अब अकेली थी बस में और वो भी कुछ कुछ ऊंघ रही थी.

अंधेरा बढ़ गया था.
ड्राइवर ने ऊपर का आईना घुमा कर बाई के हाथ पांव देखे,
और ‘दहेसर’ से पहले ही एक वीरान सी सड़क पर बस उतार दी.

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