सात सालों में छह औलादों ने निचोड़ के रख दिया जमीला को.
और ज़हूर मियां की शहवत किसी तरह कम न हुई थी...
इत्ती भी शर्म न करते थे.
अल्लाह मियां की बरकत है.
वो दे तो हम ना कहने वाले कौन?
दोस्त-यार आस-पड़ोस वाले ताने देते थे
बस करो मियां तुमने तो मशीन लगा रखी है. अरे इस बेचारी का भी ख्याल करो...!
बड़ी शैतानी नज़र आती उनकी हंसी में
जब कहते,
कोई बात नहीं,थक जाएगी तो दूसरी ले आएंगे.
बस इसी बात से डरती थी जमीला!
कहीं किसी दिन ये मसखरी सच न साबित हो जाए.
पुरानी सी बस्ती में पुराने दिनों के किरायेदार थे. तीन मंजिला बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर
तीन कमरों का घर था...
और नौ जने रहते थे.
छह औलादें,
एक जमीला की बूढ़ी मां और दो वो खुद मियां बीवी!
ज़हूर मियां जिस्म के तगड़े थे,
और मेहनतकश भी.
सारा दिन हाथगाड़ी में सामान ढोते थे.
दूकान से गोदाम तक और गोदाम से दूकान तक. सेठ खुश था.
अच्छा खासा कमा लेते थे.
बच्चों के कपड़े लत्ते के लिए तो थान के थान ही ले आया करते थे.
गली में खेलते अपने बच्चों को उनके कपड़ों ही से पहचान लेते थे.
नाम याद थे.
उंगलियों पर गिन सकते थे.
उन्हें देख के नाम नहीं बता सकते थे.
सब एक ही फैक्ट्री से निकले लगते थे.
और जमीला से कह भी रखा था,
एक वक्त में एक ही थान के कपड़े पहनाया करो. वरना कोई भी लौंडा साला अब्बा अब्बा कह के जेब में हाथ डालता है और पैसे ले जाता है.
अम्मी के मना करने पर भी उनके लिए महीने दो महीने में कोई न कोई जोड़ा ले आया करते थे. और जमीला के लिए तो हमेशा इफरात ही रही. किसी तरह की कमी न होने दी.
बहुत मुहब्बत करते थे बीवी से.
इस मुहब्बत ही का नतीजा था
कि सात सालों में छह औलादें पैदाकर दीं.
मर्दों की निस्बत औरतें आपस में ज्यादा बेबाकी से बात कर लेती हैं.
जमीला को भी आस पड़ोस वालियां समझाती थीं, बीवी,
उसकी नसबंदी कराओ या अपनी कोख निकलवा दो.
वो तो बाज़ नहीं आने वाले.
पिंड छुड़ाना भी तो सीखो.
दूसरी लाना है तो ले आए.
कुछ दिन उसे भी ये पेट गाड़ी खींचने दो.
औरतें हंस देतीं.
लेकिन जमीला का मुंह सूख जाता.
एक ने भली राय दी,
बच्चों में सोया करो.
पास आए तो चुटकी काट के जगा दिया करो. अपने आप झाग बैठ जाएगी...
और फुसफुसा के हंस दी.
जमीला से कुछ भी न हुआ.
उस रोज जब वो देर तक नहीं आया तो अम्मा को शक हो गया.
वो लक्षण समझती थी.
इशारे से बेटी को तंबिह कर दी.
दोस्तों यारों में कहीं पीने पिलाने बैठ गया होगा.
तू बच्चों में जाकर सो जाना.
और भूखे लौटे तो?
भूखा तो आएगा,पर तुझे खाएगा आ के.
उल्टा तेरा पेट भर देगा.
जमीला समझ तो गई पर मां के सामने ये कह के अंदर चली गई
खाना भर के रख देती हूं चूल्हे के पास.
गर्म रहेगा.
और वही हुआ.
ज़हूर मियां किमाम भरा पान चबाते हुए घर में दाखिल हुए.
हलकी-सी लग़जिश थी कदमों में.
जूते उतार के दबे पांव कमरे में दाखिल हुए तो जमीला को दो बच्चों के बीच सोता पाया.
गला दबा के आवाज़ दी
जमीला...
वो हिली नहीं.
ज़हूर मियां ने एक बगल के बच्चे को उठा कर पलंग वाले बच्चों में डाल दिया
और जमीला के पास आकर लेट गए.
मुंह अपनी तरफ किया तो वो उठ के बैठ गई.
क्या करते हो?...
खाना रखा है जा के खालो ना.
वो इतने ज़ोर से बोली थी कि ज़हूर मियां ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया.
आहिस्ता बोलो
बच्चे जाग जाएंगे.
अम्मा पहले ही से जाग रही थी.
एक बार जी चाहा कि उठकर चली जाए कमरे में और कह दे कि बेमौत मत मार जमीला को.
लेकिन उसे याद था कि एक बार नसीहतन कुछ कहा था तो ज़हूर मियां ने मुंहतोड़ सुना दी थी,
बीच में मत बोला करो अम्मां.
भूलो मत तुमने ग्यारह औलादें जनी थीं
और ये नवीं थी
जमीला!
अम्मां बिस्तर पे उठ के बैठ गई.
कुछ देर तक सरगोशियों की आवाज़ें आती रहीं और फिर एक थप्पड़ की आवाज आई.
डरते डरते अम्मां उठके दरवाज़े तक गई तो देखा ज़हूर मियां जमीला के मुंह में कपड़ा ठूंसे उसे सीढियों से छतकी तरफ घसीटता हुआ ले जा रहा था.
No comments:
Post a Comment