Monday, 21 July 2014

मुझे यूँ नही मरना

मुझे बस यूँ नही मरना है कि
सब मरते हुए देखे
कि मेरा मुह खुला हो
धौकनी चलती हो साँसों में
नाल इक नाक में अटकी हुई
दो बाह की नस में
मशीनों की तरफ सब देखते हो
धड़कने की लय विलंबित है
ये कितनी मात्रा पे चल रही है

मुझे बस यूँ नही मरना
कि एक्सीडेंट से कुछ यूँ गिरा
जैसे किसी के हाथ से चिल्लर बिखर जाये
अठन्नी पैसे दस पैसे चवन्नी
बड़े गुस्से में पूरा नोट फाड़ के
जैसे उडा देता है पुर्जो में
मुझे बस यूँ नही मरना

मुझे कुछ ऐसे उड़ जाना है
जैसे हिचकी लेकर ओस उड़ती है

कि जैसे शेर कहते कहते
सकता पड़ गया बस

या लिखते लिखते अफसाना
सियाही ख़त्म हो जाये

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