Friday, 18 July 2014

मुझे अफ़सोस है

मुझे अफ़सोस है सोना
कि मेरी नज़्म से हो कर गुज़रते वक़्त
बारिश में
परेशानी हुई तुम को

बड़े बे वक़्त आते हैं यहाँ सावन
मेरी नज़्मों की गलियाँ यूँ भी अक्सर भीगी रहती हैं

कई गढ़ों में पानी जमा रहता है
अगर पाँव पड़े तो
मोच आ जाने का ख़तरा है

मुझे अफ़सोस है लेकिन
परेशानी हुई होगी
कि मेरी नज़्म में कुछ रौशनी कम है
गुज़रते वक़्त
दहलीज़ों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाखून कितनी बार टूटे हैं

हुई मुद्दत कि चौराहे पे
अब बिजली का खंबा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुम को
मुझे अफ़सोस है सचमुच

No comments:

Post a Comment