एक पहाड़ी के कोने में बस्ते जितनी बस्ती थी इक बटवे जितना मंदिर था, वो भी लॉकिट जितनी नींद भरी दो बांहों जैसे मस्जिद के मीनार गले मंदिर के दो मासूम खुदा सोए थे! इक बूढ़े झरने के नीचे!
No comments:
Post a Comment