Wednesday, 23 July 2014

सरहद पर

सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला
देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
आंखों से मानूस थे सारे
चेहरे सारे सुने सुनाये
पाँव धोया
हाथ धुलाये
आँगन में आसन लगवाये
और तंदूर पे मक्की के कुछ
मोटे मोटे रोट पकाए

पोटली में मेहमान मेंरे
पिछले सालों की फसलों का गुड लाये थे

आँख खुली तो देखा
घर में कोई नहीं था
हाथ लगाकर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था

और हाथों पर मीठे गुड का जायका अब तक चिपक रहा था

ख्वाब थाशायद
ख्वाब ही होगा

सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली

सरहद पर कल रात सुना है
कुछ ख़्वाबों का खून हुआ है

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