Friday, 18 July 2014

जिस्म

मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में
अभी उसी दिन की बात है
मैं नहाने उतरा था घाट पर जब
ठिठुर रहा था
वो छू के पानी की सर्द तहज़ीब डर गया था

मैं सोचता था
बग़ैर मेरे वो कैसे काटेगा तेज़ धारा
वो बहते पानी की बेरुखी जानता नहीं है

वो डूब जाएगा
सोचता था

अब उस किनारे पहुँच के मुझको बुला रहा है
मैं इस किनारे पे डूबता जा रहा हूँ पैहम

मैं कैसे तैरूँ बग़ैर उसके
मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में

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