कभी कभी जब उतरती है
चील शाम की छत से
थकी थकी सी
जरा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी,
मसुंडे’ के पौदों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा
पिघलता जाए व्हिस्की में
मैं ‘स्कार्फ़’ दिन का गले से उतार देता हूं
तेरे उतारे हुए दिन पहन के
अब भी मैं
तेरी महक में कई रोज काट देता हूं!!
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