Wednesday, 23 July 2014

उर्दू

ये कैसा इश्क है उर्दू ज़बां का
मज़ा घुलता है लफ्जों का ज़बां पर
कि जैसे पान में महंगा क़माम घुलता है
नशा आता है उर्दू बोलने में
गिलोरी की तरह हैं मुंह लगी सब इस्तिलाहें
लुत्फ़ देती हैं.
हलक़ छूती है उर्दू तो
हलक़ से जैसे मय का घूँट उतरता है

बड़ी एरिस्टोक्रेसी है ज़बां में
फकीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू

अगरचे मानी कम होते हैं और अल्फाज़ की
इफरात होती है
मगर फिर भी
बलंद आवाज़ पढिये तो
बहोत ही मोतबर लगती हैं बातें

कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू
तो लगता है
कि दिन जाडों के हैं
खिड़की खुली है
धूप अन्दर आ रही है

अजब है ये ज़बां उर्दू
कभी यूँ ही सफर करते
अगर कोई मुसाफिर शेर पढ़ दे मीर ओ गालिब का
वो चाहे अजनबी हो
यही लगता है वो मेरे वतन का है

बड़े शाइस्ता लह्जे में किसी से उर्दू सुनकर
क्या नहीं लगता
कि इक तहजीब की आवाज़ है उर्दू

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